Wednesday, 10 August 2016

आज ब्लॉग का पहला दिन

ब्लॉग में मुझे लिखना चाहिए, इसके लिए हमारे संस्थान की अँगरेजी सह-संपादक और मेरी वरिष्ठ मित्र श्रीमती अनीता झा जी ने प्रेरित किया। ब्लॉग का अकाउंट भी खोल दिया। इसके सारे व्याकरण भी समझा गईं। उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ। जीवन के हर क्षेत्र में सिखने के लिए एक योग्य और अनुभवी प्रशिक्षक की आवश्यकता होती है। बस हमें जिज्ञासु होना चाहिए।
पिछले दिनों अनीता जी ने जब लिखना शुरू किया था तो उन्होंने हिंदी के संबंध में लिखा था। मुझे अच्छा लगा कि लेखन-संबंधी अनेक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने हिंदी में लिखना शुरू किया है। हिंदी के लिए यह अच्छी बात है और हम जैसे हिंदी-सेवकों के लिए प्रसन्नता की बात। उन्हें इस निर्णय के लिए बधाई देता हूँ। वे लिखें और खूब लिखें। मैं आगे हिंदी के सम्बन्ध में ही लिखना चाहूँगा। 

5 comments:

  1. सबसे पहले तहे दिल से शुक्रिया। मैंने सोचा है लिखूँगी जितना बन पड़ेगा और थोड़ा सा भी किसी के काम आ पायी या पयूँगी तो लिखने से भी ज़्यादा ख़ुशी मिलेगी। अपनी मात्रभाषा किसी के लिए भी सहज और सुगम होती है, और हिंदी भी मेरी मात्रभाषा है। हिंदी पर आपके विचार ज़रूर जानना चाहूँगी जो अक्सर बातचीत में कहीं छूट जाते हैं। ढेर सारी शुभकामनायें लिखिए और ख़ूब लिखिए।

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    1. मातृभाषा ...,भूल चूक लेनी देनी 😂😂😂😂

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  2. आपकी शुभकामनाओं के लिए आभारी हूँ।

    स्वतंत्रता-दिवस की वेला चल रही है। जिस दिवस की प्राप्ति में किसी एक भारतीय भाषा ने समेकित योगदान दिया है तो वह हिंदी-भाषा है। राष्ट्रपिता गाँधी, काका कालेलकर, सुभाषचन्द्र बोस, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, मैथिली शरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर इत्यादि महानुभावों ने जिस भाषा में अपनी बात देशवासियों तक संप्रेषित की, वह हिंदी है। हिंदी देश की स्वतंत्रता की भाषा रही है। इसी हिंदी ने भारत को वैश्विक पहचान दी है। इसने महाकवि तुलसीदास के 'रामचरितमानस' के साथ संपूर्ण विश्व की यात्रा की है। हिंदी की यह यात्रा अनवरत जारी है।

    हम भारतीयों की एक कमज़ोरी यदा-कदा परिलक्षित होती है कि हम अपने मूल के प्रति हीनभावना का ग्रहण कर लेते हैं, जो हमारे लिए घातक सिद्ध होती है। हमारी माँ तो माँ है, चाहे वह जिस रूप में हो। हमें समझना होगा कि हम दूसरे की माँ को सम्मान देकर अपनी माँ के सम्मान को कमतर नहीं कर सकते हैं। हम दूसरे की माँ को अपनी माँ की जगह तो दे सकते हैं, लेकिन वह हमारी जन्मदात्री माँ की जगह कैसे ले सकती है! अपनी भाषा के गौरव-बोध के लिए यही मूल विचार हमें अपनाना होगा। दूसरी भाषा के उपयोग से हमारी आर्थिक समृद्धि हो सकती है, हो भी जाए तो अच्छा, लेकिन इससे हमारी आंतरिक समृद्धि नहीं हो सकती। हम हमेशा इस तथ्य का ध्यान रखेंगे कि हमारी अपनी मातृभाषा का गौरव संरक्षित रहे।

    पुन: आपके उचित मार्गदर्शन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

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    1. माँ, मातृभाषा और मातृभूमि का स्थान बहुत ऊँचा हैं... एक बार पुनः ढेर सारी शुभकामनाएँ 🙏

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  3. Congrats on your first Blog post ! Write more . My Book on short stories : Journey from Guwahati to Machhiwara ( now in 17 countries , 132 libraries India , 3 in USA ) has been Reviewed by Madam Anita ! Check her Blog . And do read the book Sir

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